Sunday, October 23, 2011

विकास की दौड़ में पिछड़ा एमपी सीजी


विकास की दौड़ में पिछड़ा एमपी सीजी

एमपी में 75 फीसदी घरों में नहीं हैं शौचालय

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। शिवराज सिंह चौहान और डॉ.रमन सिंह चाहे कितने भी दावें करें किन्तु विकास की दौड़ में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पिछड़ चुके हें। दोनों ही सूबों में विपक्ष में विपक्ष में बैठी कांग्रेस इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने में असफल ही रही हैजिससे उस पर भाजपा से मैनेज होने के आरोपों को बल मिल रहा है। भाजपा शासित राज्य विकास की दौड़ में पिछड़ रहे हैं। इस बात का खुलासा योजना आयोग के उपाध्यक्ष एम.एस.अहलूवालिया द्वारा जारी मानव विकास प्रतिवेदन में किया गया है।

देश में मानव विकास सूचकांक में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि स्वास्थ्यपोषण तथा स्वच्छता का मुद्दा भारत के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लायड मैनपावर रिसर्च द्वारा तैयार मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2011 में यह निष्कर्ष निकाला गया है। इसमें सूचकांक में उच्चतम साक्षरता दरगुणवत्तापरक स्वास्थ्य सेवा तथा लोगों के उपभोग खर्च के आधार पर केरल को शीर्ष पर रखा गया है। इसके बाद दिल्ली को दूसरेहिमाचल को दूसरे तथा गोवा को तीसरे स्थन पर रखा गया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश के दो तिहाई परिवार पक्के घरों में रहते हैं जबकि तीन चौथाई परिवारों को घरेलू इस्तेमाल के लिए बिजली मिल रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के मानव विकास सूचकांक में बीते दशक में प्रभावी सुधार हुआ है। सूचकांक 2007-08 में 21 प्रतिशत बढ़कर 0.467 हो गया है जो 1999-2000 में 0.387 था। साथ ही इसमें रेखांकित किया गया है कि मानव विकास सूचकांक के मानकों पर छत्तीसगढ़उड़ीसा,मध्यप्रदेशउत्तरप्रदेशझारखंडराजस्थान व असम अब भी पिछड़े हैं और ये 0.467 के राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य के क्षेत्र में राजस्थान छत्तीसगढ़उड़ीसा और बिहार जैसे राज्यों के साथ काफी कमजोर स्थिति में है और इसका प्रदर्शन मानव विकास के राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है। इतना ही नहीं खाद्य और पोषण के मामले में भी स्थिति खासी खराब है। आधारभूत विकास के मामले में प्रदेशों का प्रदर्शन खासा खराब रहा है। रिपोर्ट में इस बात का भी हवाला दिया गया है कि मध्यप्रदेश,बिहार और झारखंड की तरह राजस्थान के भी 75 फीसदी घरों में आज भी शौचालय तक नहीं हैं।

सबसे बेहतर प्रदर्शन करनेवाले राज्य

केरलदिल्लीहिमाचल प्रदेशगोवापंजाब।

ख़राब प्रदर्शन करनेवाले राज्य

छत्तीसगढउड़ीसाबिहारमध्य प्रदेशझारखंडउत्तर प्रदेशराजस्थान।
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भूटान नरेश ने शादी में नहीं बुलाया सोनिया को


भूटान नरेश ने शादी में नहीं बुलाया सोनिया को

युवा तुर्क राहुल और दुष्यंत को किया निजी तौर पर आमंत्रित

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भूटान नरेश ने अपनी शादी में भारत की सत्ता और शक्ति की केंद्र श्रीमति सोनिया गांधी को आमंत्रित नहीं किया जिसके मायने राजनैतिक वीथिकाओं में खोजे जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को निजी तौर पर विवाह का निमंत्रण भेजा गया था। वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह भी विवाह का न्योता नहीं पा सके।

विदेश के मामलों में जानकारी रखने की इच्छा रखने वाले लोग इन दिनों इस नए समीकरण के निहितार्थ खोज रहे हैं कि देश के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी की अनदेखी कर सोनिया पुत्र राहुल और वसुंधरा पुत्र दुष्यंत को आमंत्रित करने के पीछे कया वजह हो सकती है। देखा जाए तो भारत और चीन से सटे भूटान के राजघराने के विवाह में पीएम और सोनिया को विवाह का न्योता अवश्य ही मिलना चाहिए था।

चीन के करीब होने के कारण इस देश में दुनिया के चौधरी अमेरिका की खासी दिलचस्पी है। जानकारों की मानें तो अमेरिका भूटान में अपना एक बेस तैयार करना चाह रहा है जहां से वह चीन पर नियंत्रण का ताना बाना बुन सके। वैसे भी भूटान राजघराने के नार्वे,डेनमार्क और ग्रेट ब्रिटेन के राजघरानों से अच्छे ताल्लुकात किसी से छिपे नहीं हैं। अमेरिका को अगर भूटान से सीधी दखल नहीं मिल पाई तो वह इन राजघरानों के माध्यम से वहां प्रवेश करने की कोशिश कर सकता है।

भारत इस समय उहापोह की स्थिति में है। अगर भारत इस मामले में लचीला रूख अपनाता है और अमेरिका भूटान में घुसकर चीन को नियंत्रित करने का प्रयास करता है तो इसके दुष्प्रभाव भारत को ही भोगने होंगे क्योंकि उन परिस्थितियों में चीन भारत पर दबाव बनाना आरंभ कर देगा। अगर भूटान अमेरिका की सेना का बेस बनता है तो फिर भारत को चीन और अमेरिका दोनों ही से जूझना पड़ सकता है।
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Wednesday, June 22, 2011

बिजली से महरूम हैं डेढ़ हजार गांव

बिजली से महरूम हैं डेढ़ हजार गांव

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने किया खुलासा

पिछले साल महज 351 गांव ही हो सके विद्युतीकृत

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारत देश को आजाद हुए 64 साल बीत चुके हैं। देश पर ब्रितानी हुकूमत के बाद कांग्रेस और भाजपा ने ही सबसे ज्यादा राज किया है। सियासी दलों के लिए यह शर्म की बात हो सकती है कि लगभग साढ़े छः दशकों बाद भी देश के हृदय प्रदेश के 1535 गांव के लोगों को यह पता नहीं है कि बिजली किस चिड़िया का नाम है। कंेद्रीय विद्युत प्राधिकरण की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।

एक तरफ तो ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए केंद्र सरकार पूरी तरह संजीदा होकर अपना खजाना खोल रही हैवहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन में ढील डाली जा रही है। वैसे तो मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर भेदभाव के आरोप जब तब मढ़ दिए जाते हैं पर भारी भरकम केंद्रीय इमदाद मिलने के बाद भी जमीनी हालात कुछ और बयां कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में सुसुप्तावस्था में पड़ी कांग्रेस निजाम बदलने के बाद भी नींद से नहीं जाग सकी है।

इस प्रतिवेदन में कहा गया है कि मध्य प्रदेश में कुल 52 हजार 117 गांव हैं एवं वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 में महज 351 गांवों में ही विद्युतीकरण किया जा सका है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने ग्रामीण विद्युतीकरण की धीमी रफ्तार पर गहरी चिंता जताई है। उधर मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय मदद का उपयोग किसी अन्य मद में किए जाने से यह काम पिछड़ रहा है।

कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल का विघटन कर वर्ष 2002 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व में कंपनियों का गठन कर दिया गया था। इसके बाद कंपनियों ने गावों में प्रकाश पहुंचाने के काम में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार विद्युतीकृत गांवों मंे चोबीसों घंटे बिजली देने के लिए फीडर विभक्तिकरण के काम को अंजाम दे रही है। यह अलहदा बात है कि इसके बाद भी गांवों को आठ घंटे से ज्यादा बिजली नहीं मिल पाएगी। गांवों मंे बिजली पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की राशि को फीडर विभाजन में व्यय किया जा रहा है। यही कारण है कि गावों को विद्युतीकृत करने का काम पूरी तरह उपेक्षित 

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2012 की चिंता में प्रतिभा ताई


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

2012 की चिंता में प्रतिभा ताई
देश की पहिला महिला महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकल जुलाई 2012 में प्रतिभा देवी पाटिल में समाप्त होने जा रहा है। वे एक बार फिर रायसीना हिल्स पर स्थित महामहिम भवन में पांच साल और राज करने की इच्छा मन में दबाए बैठी हैं। राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी को शायद इस बात की भनक लग गई है। पिछले दिनों उन्होंने एक बयान में कहा था कि हमारी प्रेजीडैंट ज्यादातर मामलों में उदासीन ही रहा करती हैं। राष्ट्रपति भवन के सूत्रों का कहना है कि महामहिम को इसकी जानकारी मिलते ही वे सचेत हो गईं हैं। रामलीला मैदान पर पुलिसिया अत्याचार का ज्ञापन सौंपने गए भाजपा के प्रतिनिधिमण्डल से प्रतिभा ताई ने आम परंपराओं को ताक पर रख दिया। आड़वाणी की ओर मुखातिब प्रतिभा ताई बोलीं -''आप लोग जो ज्ञापन मुझे सौंप जाते हैंउन्हें मैं बहुत ही ध्यानपूर्वक पढ़ती हूं और फिर संबंधित मंत्रालय को भेजती हूं। इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर अनेक बार मैं खुद ही उसका फालोअप लेती हूं।'' प्रतिभा पाटिल के इस अप्रत्याशित कथन से सियासी हल्कों में यह बात तैर गई है कि भाजपा की बैसाखी बिना अगली बार कोई भी राष्ट्रपति नहीं बन सकता है।

सलमान के साथ उछला हरवंश का नाम!
काले हिरण मामले में विवादित हुए वालीवुड अभिनेता सलमान खान के सितारे इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं। हाल ही में मुंबई के पनवेल में एक जीमन से लोगों को बेदखल कर उसे खरीदने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। आरोपित है कि इसे सिने अभिनेता सलमान खान से खरीदा है। मुंबई से प्रकाशित एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र के ईपेपर की कापी इन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के दिल्ली स्थित मुख्यालय की सुर्खी बना हुआ है। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से डाक से भेजी गई इस फोटो कापी में सलामन के साथ ही साथ कांग्रेस के एक नेता 'हरवंश सिंह'द्वारा भी इस जमीन को खरीदने की बात कही गई है। इस कापी से स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि हरवंश सिंह कौन हैं,किन्तु मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह मूलतः छिंदवाड़ा जिले के हैं पर उनकी कर्मभूमि सिवनी बन गई हैसो उनके चाहने वाले इसमें उल्लेखित नाम को उनसे जोड़कर ही देख रहे हैं।

ममता से सुरक्षित दूरी बनाकर चल रही कांग्रेस
पश्चिम बंगाल में तीन दशक पुरानी वाम सरकार को भले ही ममता बनर्जी ने उखाड़ फेंका होपर कांग्रेस ने इशारों ही इशारों में उसे संकेत दे दिए हैं कि वह कांग्रेस को हल्के में न ले। ममता बनर्जी की ताजपोशी में सोनिया गांधी ने अपनी उपस्थिति दर्ज न करवाकर 2012 में वाम दलों के साथ तालमेल के विकल्प को खुले रखा है जिससे ममता की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकना स्वाभाविक ही है। इसके पहले सोनिया ने मुफ्ती मोहम्मद सईद और उमर उबदुल्ला की ताजपोशी में शिरकत की थी। सियासी जानकारो का कहना है कि अगर सोनिया कोलकता जाकर ममता के शपथ ग्रहण में शामिल होती तों यह कांग्रेस का त्रणमूल के सामने आत्मसमर्पण माना जाता। ममता ने भले ही प्रणव मुखर्जी का पैर छूकर आर्शीवाद लिया हो पर कांग्रेस उन्हें स्थापित होने का मौका नहीं देना चाह रही है।

बाबा को बॉय बॉय कह सोनिया उड़ीं पीहर की ओर
इधर स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में अनशन पर बैठे थेवहां सरकार की हालत बिगड़ती जा रही थी। वजीरे आजम के निवास 7 रेसकोर्स रोड़ और कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र सोनिया के निवास 10जनपथ की अघोषित जंग को हवा उस वक्त मिली जब बाबा के अनशन का दंश झेल रही कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को बेसहारा छोड़कर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी चुपचाप दुबई के रास्ते अपने पीहर इटली रवाना हो गईं। खबर है कि प्रियंका अपने बच्चों और राहुल के साथ अपनी नानी से मिलने जा रहे हैं। वैसे भी गर्मी में सोनिया का इटली जाना और सर्दियों में उनकी मां क्रिसमस मनाने सोनिया के घर जरूर आती हैं। कहा जा रहा है कि सोनिया को उनकी किचिन कैबनेट ने मशविरा दिया कि बाबा रामदेव के मामले में अगर आप सामने आईं तो भाजपा इसमें मिशनरी वर्सेस हिन्दू का कार्ड खेल सकती है। यही कारण है कि आजादी के उपरांत ताकतवर हुआ कांग्रेस और भाजपा का 'गांधी परिवारइस मामले में मौन साधे हुए है।

कट सकता है वृंदा का टिकिट
माकपा के अंदर करात दंपत्ति के खिलाफ गुस्सा फटने लगा है। पोलित ब्यूरो के दो महत्वपूर्ण सदस्य सीताराम येचुरी और वृंदा करात की राज्य सभा की सदस्यता इस साल अगस्त में ही समाप्त होने वाली है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे को महज एक सीट से ही संतोष करना पड़ सकता है। वाम मोर्चे के अंदर चल रही चर्चाओं के अनुसार 34 साल के वाम दलों के शासन के उपरांत उसका सफाया अगर हुआ है तो इसके पीछे करात दंपत्ति की गलत नीतियां ही हैं। प्रकाश करात और वृंदा करात के खिलाफ उपजे इस रोष का शमन होता नहीं दिख रहा है। सूत्रों की मानें तो सीताराम येचुरी को तो पार्टी ने राज्य सभा से वापसी के लिए हरी झंडी दे दी है पर वृंदा को रेड सिग्नल दिखा दिया है। बंगाल के साथ ही साथ केरल में सफाए का सारा दोष करात दंपत्ति के सर मढ़ दिया गया है।

बंद हो सकता हैं डाक टिकिट चलन!
चवन्नी से कम की भारतीय मुद्रा का प्रचलन समाप्त कर दिया गया है। अब डाक टिकिटों पर संकट के बादल छाते दिखाई दे रहे हैं। डाक टिकिटों के स्थान पर कंप्यूटर से निकलने वाली रसीद का तेजी से बढ़ा चलन इस ओर इशारा कर रहा है कि जल्द ही डाक टिकिट भी इतिहास की वस्तु में शामिल होने की तैयारी में है। डाक विभाग के माध्यम से स्पीड पोस्टरजिस्ट्री आदि करने पर अब डाक टिकिट के बदले रसीद दिए जाने का चलन बढ़ गया है। इसी तरह बड़े उपभोक्ताओं ने फ्रेंकिग मशीन के माध्यम से डाक टिकिट लगाने आरंभ कर दिए हैं। देश के लगभग सभी पोस्ट ऑफिस को कंप्यूटरीकृत करने के बाद अब सभी को ऑन लाईन एक दूसरे से जोड़ने की योजना भी जारी है। वैसे भी सरकार की मिली भगत से कोरियर कंपनियों ने भारतीय डाक विभाग की कमर तोड़ रखी है।

सहाराश्री और बाबा की बढ़ती निकटता
अपने बलबूते पर करोड़ों अरबों का कारोबार खड़ा करने वाली दो हस्तियों के बीच इन दिनों काफी नजदीकी देखने को मिल रही है। साहारा समूह के सुब्रत राय सहारा और योग के नाम पर दौतल एकत्र करने वाले बाबा रामदेव के बीच काफी लगाव है। बाबा रामदेव गाहे बेगाहे सहाराश्री का चार्टर्ड विमान इस्तेमाल कर लेते हैं। पहले की बात अलहदा मानी जा सकती हैअब तो हरियाण के रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव देश के घोषित अरबपति हो चुके हैं,इसलिए वे खुलेआम किराए के विमान या हेलीकाप्टर का उपयोग कर सकते हैं। बाबा रामदेव का रूख अगर आक्रमक रहा तो आने वाले समय में केंद्र सरकार का शिकंजा सहारा श्री पर कस जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। साथ ही साथ बाबा के अनन्य भक्त और बिल्डर्स की दुनिया के माफिया सुधाकर शेट्टी द्वारा अनशन में अपने खर्च पर बीस हजार लोगों को भेजना कांग्रेस को नागवार गुजरा है सो उनका नपना तो तय ही है।

बिना नेता प्रतिपक्ष के असम विधानसभा!
असम में कांग्रेस की धमाकेदार वापसी हुई तो विपक्ष औंधे मुंह गिरा हुआ है। असम में पहली बार एसा हो रहा है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ही नहीं होगा। 126 सदस्यीय विधानसभा में एक भी नेता प्रतिपक्ष नहीं होना अपने आप में अनोखी मिसाल ही होगी। आला अफसरान का मानना है कि मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत पाने के लिए सूबे में किसी भी सियासी दल के पास न्यूनतम विधायक संख्या भी नहीं है। विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी के पास न्यूनतम 21 विधायकों का होना आवश्यक हैपर बोडोलेण्ड पीपुल्स फ्रंट ने 12 असम गण परिषद ने 10 तो असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 18 सीटें जीती हैं। इन परिस्थितियों में प्रमुख विपक्षी पार्टी की आसनी खाली ही रह गई है। विपक्ष के नेता के मामले में विधानसभा और संसद के अपने अपने तय नियम हैंकिन्तु इनमें संशोधन के लिए वे स्वतंत्र हैं।

सड़कों के बाद अब नामकरण में वृक्षों की बारी
इस नश्वर देह को त्याग चुके अनेक अतिमहत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण लोगों की याद में सड़कों के नामकरण का रिवाज बड़ा पुराना है। देश के कमोबेश हर शहर में सड़कों का नाम किसी महान हस्ती से जुड़ा हुआ है। दिल्ली की हर सड़क किसी न किसी के नाम पर ही है। व्हीआईपी और व्हीव्हीआईपीज की फेहरिस्त इतनी लंबी हो चली है कि दिल्ली में अब सड़कें ही नहीं बची हैंजिनका नामकरण किया जा सके। दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली विकास प्राधिकरण से इस बारे में इजाजत मांगी है कि मिलेनियम पार्क मंे महत्वपूर्ण लोगों के नाम से पेड़ आवंटित कर दिए जाएं। दिल्ली सरकार के पास वैसे भी हर साल दो सैकड़ा से अधिक आवेदन इस बात को लेकर आते हैं कि किसी के नाम पर सड़क का नामकरण कर दिया जाए। दिल्ली सरकार परेशानी बढ़ती ही जा रही हैक्योंकि मुख्य मार्ग तो छोड़ें बाई लेन तक का नामकरण किया जा चुका है।

मल्टीनेशनल्स के निशाने पर चिकित्सा विभाग
देश में जीवन रक्षक औषधियों पर मूल्य नियंत्रण लागू न हो पाने का कारण मल्टीनेशनल कंपनियों की मुगलई है। दो अलग अलग कंपनियों में एक ही दवा की कीमत में दस गुना का अंतर होना आम बात है। केंद्र सरकार से लेकर दवाओं और योग के माध्यम से अरबपति बने स्वयंभू योग गुरू तक इस बारे में खामोशी अख्तियार किए हुए हैं। असंयमित दिनचर्या और खान पान के चलते मधुमेह का गढ़ बन चुके हिन्दुस्तान में अब महज दो रूपए में शुगर की जांच हो सकेगी। वर्तमान में इसका खर्च औसतन पचास से सौ रूपयों के बीच बैठता है। हाल ही में इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडीकल रिसर्च ने इस बारे में कहा है कि इतने कम खर्च में शुगर की जांच से गरीबों को बेहद फायदा हो सकेगा। चिकित्सकों को जेब में रखने वाली मल्टीनेशनल दवा कंपनियां अब इस फिराक में हैं कि दो रूपए में मधुमेह की जांच की योजना को अमली जामा न पहनाया जा सके। अब देखना यह है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का इस मामले में क्या रूख रहता है।

21 जवानों को लील गया मच्छर
कहने को तो मच्छर बहुत ही छोटा सा उड़ने वाला जीव है,जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है। मच्छर के कारण न जाने कितने लोगों को असमय ही काल के गाल मंे समाना पड़ा था। आजादी के साल अर्थात 1947 में ही आठ लाख लोग मलेरिया के चलते जान गवा चुके हैं। केंद्र सरकार ने इसके बाद राष्ट्रीय मलेरिया उन्नमूलन कार्यक्रम का आगाज किया था। कालांतर में इसका नाम परिवर्तित हो गया। छः दशकों में मच्छरों का सफाया तो नहीं हुआ अलबत्ता मलेरिया विभाग का नामोनिशान मिट गया है। वर्ष 2010 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के 21 जवानों की मलेरिया से मौत होने पर सीआरपीएफ की व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गए हैं। सबसे ज्यादा छः जवान छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं। दरअसल जंगली इलाकों में गश्त के दौरान जवानों को मच्छरों का शिकार बनना पड़ता है,फिर वहां समुचित चिकित्सा सुविधा न मिल पाने से उनकी हालत बिगड़ जाती है।

टीवी पर अशलीलता परोसी तौ खैर नहीं!
छोटे पर्दे पर किसी का जोर नहीं चल पर रहा है। यही कारण है कि टीवी पर चेनल्स द्वारा हंसी मजाक के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है। फिल्म सेंसर बोर्ड की तर्ज पर अब केंद्र सरकार द्वारा टेलीवीजन चेनल्स के लिए भी नियामक संस्था का गठन कर दिया गया है। केंद्र सरकार को टीवी पर अश्लीलता और आक्रमता को लेकर लगातार ही शिकायतें मिल रही थीं। इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने 13 सदस्यीय ब्राडकास्ट कंटेंट कम्प्लैंट्स काउंसिल का गठन कर दिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश ए.पी.शाह को इसका अध्यक्ष मनोनीत किया गया है,जिन्होंने अपना पदभार ग्रहण कर लिया है। यह संस्था देश भर के साढ़े पांच सौ से अधिक टीवी चेनल्स पर नजर रखने का काम करेगीअश्लीलता और आक्रमकता पर कठोर कार्यवाही कर जन शिकायतों पर चेनल्स को दिशा निर्देश जारी करने का काम करेगी।

शंकराचार्य की शरण में सोनिया
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर सभी की नजरें गड़ी हैं। सारे सियासी दल मान रहे हैं कि जिसने भी यूपी में परचम लहरा दिया वह अगले आम चुनावों में इसका सबसे ज्यादा लाभ प्राप्त कर सकता है। कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के अल्पसंख्यक प्रेम से कांग्रेस की राजमाता को लगने लगा कि यूपी में मुसलमान कांग्रेस से नाराज हो सकते हैं। सोनिया मण्डली ने उन्हें भरमाया और संगठन के एक जरूरी कार्यक्रम में भाग लेने बनारस आईं सोनिया प्रोग्राम के पहले ही गाजीपुर के सैदपुर के लिए उड़ गईं। उनका चौपर जहां लेण्ड किया वहीं पास में शंकराचार्य का आश्रम था। सोनिया ने आधे घंटे से ज्यादा समय शंकराचार्य के साथ बिताया और सोने का मुकुट उन्हें पहनाया। सियासी हल्कों में सोनिया के एक कृत्य की दबी जुबान से चर्चा होने लगी है कि आखिर किसके पैसों से मंहगे सोने का मुकुट सोनिया ने अर्पित किया। क्या आयकर विभाग इस बारे में सोनिया से कुछ दरयाफ्त करने की जहमत उठाएगा?

पुच्छल तारा
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव के कस बल कांग्रेस ने ढीले कर दिए हैं। बाबा की हुंकार में अब पहले जैसी तल्खी दिखाई नहीं पड़ रही है। उधर अन्ना हजारे के स्वर बुलंद होते दिख रहे हैं। सरकार का दमन का डंडा तेजी से घूम रहा है। अन्ना हजारे के घर पर भी आयकर अधिकारी धमक गए। जो सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की जहमत कर रहा है सरकार या तो पुलिस या फिर आयकर के माध्यम से उसे धमका रही है। हालाता ब्रितानी सत्ता जैसे हो गए हैं। उत्तरांचल के रूड़की से दिशा नागर ने ईमेल भेजा है। दिशा लिखती हैं कि जगजाहिर है''देश की बागडोर सोनिया गांधी के हाथों में है। सोनिया राजनैतिक रूप से अपरिपक्व हैं। वे एक एसी गुडिया हैं जो चाबी से चलती है। उन्हें जितना बोलने की ताकीद दी जाती है वे उतना ही बोलती हैं। उन्होंने कभी प्रेस कांफ्रेंस का सामना नहीं किया। कांग्रेस के मैनेज्ड पत्रकार उनका साक्षात्कार लेते हैं। वे भारतीय समाज के रीति रिवाजरहन सहन आदि से भली भांति परिचित नहीं हैं। इन परिस्थितियों में देश में सामंतवादी मानसिकता का आगाज होना कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है।
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शिक्षा के व्यवसायीकरण से सिमट गए मूल्य

शिक्षा के व्यवसायीकरण से सिमट गए मूल्य

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में केंद्र सरकार का मानव संसाधन मंत्रालय देश में शिक्षा की नीति रीति को निर्धारित करने के लिए पाबंद किया गया था। अस्सी के दशक के उपरांत सियासी दलों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए शिक्षा व्यवस्था को गिरवी रख दिया है। अनुशासन की मजबूत नींव पर खड़ा नालंदा विश्वविद्यालय आठ शताब्दियों तक लोगों को शिक्षित करता रहा हैै। एक समय था जब गुरूकुल में जाकर बच्चे अपने भविष्य को संवारते थे, आज जमाना पूरी तरह बदल चुका है। आज गुरूकुलों का स्थान मोटी कमाई वाले विद्यालयों ने ले लिया है, जहां शिक्षा के नाम पर डिग्रीयां बांटी जाकर अभिभावकों की जेबें तराशी जा रही हैं। हुकूमत को यह दिखाई नहीं दे रहा है कि शिक्षा इस कदर मंहगी हो चुकी है कि अब बैंक द्वारा भी 'एजूकेशन लोन' दिया जाने लगा है। क्या इक्कीसवीं सदी के भारत में शिक्षा के व्यवसायीकरण का सपना देखा था देश को गोरे ब्रितानियों के हाथों से मुक्त कराने वाले आजादी के दीवानों ने!


'गुरू गोबिंद दोउ खड़े, काके लागू पाय!

बलिहारी गुरू आपकी, गोविंद दियो बताए!!'

यह दोहा आज के समय में बहुत ही प्रासंगिक है। आदि अनादि काल से बच्चे की पहली शिक्षक उसकी मां ही होती है। मां अगर पिता को 'पापा' संबोधन करने कहेगी बच्चा उसे पापा कहेगा, वह अगर 'पिताजी' कहने कहेगी, बच्चा उसका अनुसरण करेगा, वह अगर 'बाऊजी' कहने को कहेगी, बच्चा वही कहेगा। बच्चे को क्या पता कि पिता को किस संबोधन से बुलाना है, पर बच्चा इंसान का हो या गाय का, जब भी बोलता है तो मां को मां ही कहता है। बछड़ा जब रंभाता है तो उसके मुंह से मां की सुमधुर आवाज ही प्रस्फुटित होती है।

आदि अनादि काल से शिक्षा का तात्पर्य आदर, सत्कार, न्याय, सदगुणों का विकास, चिंतन, सहिष्णुता, सहानभूति, सेवा, सद्भाव, चिंतन, सहयर्च, संस्कार आदि का ज्ञान माना जाता रहा है। कालांतर में शिक्षा के मायने ही बदल गए। याद पड़ता है जब हम खुद प्राथमिक या माध्यमिक स्तर में अध्ययनरत थे, तब किसी शिक्षक के सिनेमा थिएटर में दिख जाने मात्र से घिघ्घी बंध जाती थी। सिनेमा में मनोरंजन तो एक तरफ मानस पटल पर तरह तरह के प्रश्न कौंधा करते थे कि अगर मास्साब ने पूछ लिया कि सिनेमा क्यों गए थे, तो क्या जवाब देंगे। आज हालात उल्टे हैं। आज तो मदिरालय में शिक्षक और उनके छात्र अगल बगल की टेबिलों पर बैठकर जाम छलकाते और सिगरेट के छल्ले बनाते नजर आते हैं। नैतिक मूल्यों के अवमूल्यन के लिए हमारी शिक्षा प्रणाली ही पूरी तरह दोषी करार मानी जाएगी।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते इस बात को कि उमरदराज लोगों को बताना पड़े कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है? आजाद भारत में भी शिक्षा का तात्पर्य डिग्री लेने के साथ ही साथ व्यवहारगत, परिवारगत और संस्कारगत मूल्यों का विकास ही शिक्षा का पर्याय समझा जाता था। देश के अनेक विश्वविद्यालय इस बात के पोषक रहे हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। आज के युग में शिक्षा की 'दुकानें' डिग्री तो बांट रही हैं किन्तु नौनिहालों को व्यवहारिक प्रशिक्षण से कोसों दूर रखा जा रहा है।

ऋषि मुनियों के आश्रम में शिक्षा के लिए गए राजकुमार को भी खुद ही खाना पकाने की लकड़ी बीनने जाना होता था। खुद ही आंगन लीपना होता था। चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए राजकुमार को भी जीवन के हर काम से खुद को वाकिफ करवाना होता था। आज शिक्षा का स्वरूप है महज डिग्री लो और नौकरी करो। मीडिया का ही उदहारण लिया जाए, तो देश में 'पत्रकार' बनाने की न जाने कितनी फेक्ट्रियां (माॅस कम्यूनिकेशन कालेज) हैं, जिनमें पढ़कर निकलने वाले नौजवान आज इलेक्ट्रानिक मीडिया की चकाचैंध में अपने आप को झौंके जा रहे हैं। इनमें से अस्सी फीसदी को यह नहीं पता होगा कि किसी राज्य का सबसे बड़ा सरकारी नुमाईंदा और सबसे छोटा सरकारी नुमाईंदा कौन होता है? इन्हें इस बात का भी इल्म नहीं होगा कि पुलिस की वर्दी में कितने सितारे वाला किस स्तर का अधिकारी है?

टीवी के आने से पूर्व छात्र अध्ययन में अपना समय व्यतीत करते थे। अस्सी के दशक के पहले बच्चे को अलह सुब्बह उठाने के लिए मां बच्चे से कहती देखो चिडि़या आ गई, देखो तोता आया, कोयल बोली, आज बच्चे को नींद से जगाने के लिए टीवी आॅन कर मां कहती है देखो डोरेमाॅल आ रहा है। बच्चा आंख मीचते हुए उठ बैठता है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि बच्चों का नैसर्गिक विकास इन परिस्थितियों में कैसे हो सकता है?

प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी के शासनकाल से शिक्षा को लेकर प्रयोग करने का सिलसिला आरंभ हुआ। शिक्षा को लेकर भारत गणराज्य में जितने प्रयोग हुए उतने शायद ही किसी अन्य देश में हुए हों। एक जमाना था जब हम खुद भी प्राथमिक कक्षाओं में ज्ञानार्जन किया करते थे, हमारे जैसे अनेक विद्यार्थी इस बात के गवाह होंगे कि उस वक्त निर्धारित पाठ्यक्रम के स्थान पर व्यवहारिक शिक्षा को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। उस काल की शालाओं को हम 'आधुनिक गुरूकुल' की संज्ञा भी दे सकते हैं।

जमाना बदलता रहा और शिक्षा के तौर तरीकों में भी बदलाव होता रहा। बदलाव सतत प्रक्रिया है, जिसे रोका नहीं जा सकता है। आजाद भारत में सत्तर के दशक तक बदलाव की बयार बेहद ही मंदी थी। इसके उपरांत बदलाव की आंधी सी आ गई। अस्सी के दशक तक महाविद्यालयों में पढ़ाई के लिए विद्यार्थी पूरे साल मेहनत किया करते थे, इसके उपरांत 'वन डे सीरिज', 'ट्वेंटी क्वेश्चन्स', 'गागर में सागर' जैसी बीस से तीस पेज की किताबों ने विद्यार्थियों को आकर्षित किया। इसके बाद विद्यार्थियों को लगा कि साल भर पढ़कर परीक्षा देना बेवकूफी ही है।

जब जब सरकारें बदलीं सियासी दलों का पहला निशाना शिक्षा व्यवस्था ही बनी, जिस पर हमला कर ध्वस्त करने का प्रयास किया गया। भूत, वर्तमान और भविष्य को देखने के बजाए देश के नीति निर्धारकों ने अपने निहित स्वार्थों को तवज्जो देकर शिक्षा व्यवस्था का कचूमर ही निकाल दिया। रही सही कसर शाला प्रबंधनों द्वारा निकाल दी जाती है। निजी तौर पर संचालित होने वाले अनेक शैक्षणिक संस्थानों में प्रबंधन के तुगलकी फरमान बच्चों और उनके पालकों की जान निकालने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं। सुप्रसिद्ध उपन्यास 'राग दरबारी' में इस बात को चिन्हित करते हुए कहा गया है कि 'हमारी शिक्षा नीति एक एसी कुतिया है, जिसे हर कोई लतियाता चलता है।'

केंद्र और राज्य सरकारों की कथित अनदेखी के कारण आज देश में शिक्षा इतनी मंहगी हो चुकी है कि आम आदमी की पहुंच से लगभग बाहर ही है शिक्षा का अधिकार। केंद्र सरकार ने भले ही शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया हो पर इसके अमली जामा पहनने में संशय ही लगता है। इसमें कुल क्षमता का पच्चीस फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार के बच्चों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। कल्पना कीजिए कि टाटा या बिडला की संतानें जिस शाला में पढ़ रही हों उनके बाजू में उनके घर काम करने वाली बाई का बच्चा बैठे तो क्या यह इन अमीरजादों को गवारा होगा?

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करते समय कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने वादे बहुत ही बड़े किए थे किन्तु आज इसकी सरेराह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। किसी भी सियासी दल या सूबे को इस बात की चिंता नहीं है कि वह कानून का उल्लंघन कर रहा है। छः से 14 साल तक के बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को देश भर में लागू किए जाने के एक साल बाद भी यह समूचे देश में लागू नहीं हो सका है। आज यह देश के महज 18 राज्य जिनमेें आंध्रप्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, बिहार, चंडीगढ़, अरूणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, दादर नगर हवेली, दमन द्वीव, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, लक्ष्यद्वीप, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम शामिल हैं, में अधिसूचित हो चुका। इसके अलावा केंद्र की नाक के नीचे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, गुजरात, पश्चिम बंगाल जैसे बड़े सूबों में यह लागू नहीं हो सका है।

आंकड़ों पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो देश में आज भी 49 फीसदी स्कूलों में खेल का मैदान तक नहीं है। कुल आबादी में से महज 48.12 फीसदी बालिकाएं ही उच्च प्राथमिक स्तर तक पहुंच पाती हैं। कच्ची मट्टी को गढ़ने वाले 21 फीसदी शिक्षकों के पास पेशेवर डिग्री ही नहीं है। 21 फीसदी शालाओं में महज एक ही शिक्षक हैं। 41 फीसदी शालाओं में बालिकाओं के लिए शौचालय की व्यवस्था तक नहीं है। देश के 324 जिलों में निर्धारित मानकों के अनुसार शिक्षक नहीं हैं। आरटीई के लागू होने के बाद भी देश में 81 लाख पचास हजार 619 बच्चों ने शाला का मुंह नहीं देखा है।

सरकारी शालाओं का स्तर पूरी तरह गिर जाने से शिक्षा की दुकानों के लिए उपजाऊ माहौल तैयार हो गया है। राजनैतिक संरक्षण से देश भर में शिक्षा की दुकानें सज चुकी हैं, जहां प्रवेश के समय मोटा डोनेशन लिया जाता है। केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के केपीटेशन फीस न लेने के सख्त आदेश की धज्जियां जहां तहां उड़ती दिख ही जाती हैं। छोटे छोटे शहरों में भी शालाओं द्वारा दस से पचास हजार रूपए तक का डोनेशन लिया जाता है। मजे की बात तो यह है कि शाला में उत्तीर्ण होने वाले छात्र को दोबारा उसी शाला में फ्रेश एडमीशन लेना पड़ता है, जिससे सारी फीस का दुबारा भोगमान उसके पालक को ही भोगना पड़ता है। मनमानी पर उतारू शाला प्रबंधनों द्वारा बोर्ड की कक्षाओं को छोड़कर शेष कक्षाओं में मनमाना सिलेबस और लेखक की किताबें दुकान विशेष से ही खरीदने पर विद्यार्थियों को बाध्य किया जाता है। इतना ही नहीं गणवेश में नित परिवर्तन कर दुकान विशेष से गणवेश खरीदवाकर शाला प्रबंधन मालामाल हुए जा रहे हैं।

आज के समय में शिक्षा को महज डिग्री लेकर नौकरी करने और शादी करने का साधन बना लिया गया है। आज के समय में अगर कोई किसी को भी गलत रास्ते पर चलकर नीचता, बेईमानी, धूर्तता के साथ अमीर बनकर सफल होते देखेगा तो क्या वह नीतिगत सिद्धांतों की शूल भरी राह पर चलने का साहस जुटा पाएगा? उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही होगा। जब संस्कारों से युक्त सिनेमा, टीवी सीरियल्स का स्थान फूहड़ता ने ले लिया हो तो हमारी युवा पीढ़ी गांधी के मार्ग का अनुसरण करे इसमें संशय ही प्रतीत होता है।

शिक्षकों को अध्यापन कार्य से इतर 'बेगार' के कामों में लगाने से उसका ध्यान अपने मूल काम से भटकना स्वाभाविक ही है। यह स्थापित सत्य है कि शिक्षक देश का भविष्य गढ़ते हैं और कच्ची माटी को सुंदर स्वरूप देने वाले आचार्यों को अगर जनगणना, मतदाता सूची, पल्स पोलियो जैसे कामों में लगा दिया जाए तो उनका ध्यान अध्यापन में भला क्यों लगेगा। मजे की बात तो यह है कि सरकार के पास जनगणना, चुनाव आयोग और स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारियों की खासी फौज होने के बाद भी शिक्षकों से बेगार करवाया जाता है। यही कारण है कि शिक्षकों द्वारा अपने मूल काम को तवज्जो देना बंद कर दिया है। अध्यापन में महारथ रखने वाले शिक्षकों द्वारा सरकारी चिकित्सकों के मानिंद अपने कर्तव्यों को निजी स्तर पर घर या कोचिंग क्लासिस में इसका भरपूर उपयोग कर धर्नाजन किया जा रहा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग में शिक्षा को व्यवसाय बना लिया गया है, जिसकी रोकथाम के उपाय करने ही होंगे, किन्तु विडम्बना यह है कि सरकार इस दिशा में संजीदा होती दिखाई नहीं पड़ती।

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